माइलेज रीइम्बर्समेंट कैलकुलेटर क्या है?
माइलेज रीइम्बर्समेंट कैलकुलेटर यह हिसाब लगाता है कि अपनी निजी गाड़ी से काम, चैरिटी, मेडिकल या किसी अन्य कटौती-योग्य कारण से यात्रा करने पर आपको कितनी राशि मिलनी चाहिए। बस चली गई मील की संख्या को तय की गई प्रति मील दर से गुणा कर दीजिए। कई कंपनियाँ और टैक्स विभाग एक मानक "सेंट प्रति मील" दर तय करते हैं (जैसे अमेरिका में IRS की स्टैंडर्ड माइलेज रेट), लेकिन यह टूल आपके द्वारा डाली गई किसी भी दर को स्वीकार करता है — इसलिए यह किसी भी देश या किसी भी मुद्रा में काम करता है। ध्यान रहे, भारत में ऐसी कोई एकसमान सरकारी दर नहीं है; यहाँ आमतौर पर कंपनी अपनी नीति के अनुसार प्रति किलोमीटर दर तय करती है।
इसका उपयोग कैसे करें
उस यात्रा या अवधि के लिए कुल चली गई मील दर्ज करें, फिर अपनी प्रति मील दर डालें (उदाहरण के लिए 67 सेंट प्रति मील के लिए 0.67)। कैलकुलेटर तुरंत आपकी कुल रीइम्बर्समेंट राशि के साथ-साथ डाले गए आँकड़ों का ब्यौरा भी दिखा देता है।
फ़ॉर्मूला समझें
गणित बहुत सीधा है:
$$\text{रीइम्बर्समेंट} = \text{चली गई मील} \times \text{प्रति मील दर}$$
अगर आपने \(\$0.67\) प्रति मील की दर से 250 मील की यात्रा की, तो रीइम्बर्समेंट होगा $$250 \times 0.67 = \$167.50$$। चूँकि यह केवल एक गुणनफल है, इसलिए मील दोगुनी होने पर भुगतान भी दोगुना हो जाता है, और दर बदलने पर कुल राशि उसी अनुपात में घटती-बढ़ती है।
हल किया हुआ उदाहरण
मान लीजिए एक सेल्स प्रतिनिधि ने एक महीने में 1,200 बिज़नेस मील दर्ज कीं और कंपनी \(\$0.655\) प्रति मील की दर से भुगतान करती है। रीइम्बर्समेंट होगा $$1{,}200 \times 0.655 = \$786.00$$। 1200 और 0.655 डालते ही यह आँकड़ा तुरंत सामने आ जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मुझे कौन-सी दर इस्तेमाल करनी चाहिए? वही दर जो आपकी कंपनी ने तय की हो, या आपके देश और कारण (बिज़नेस, मेडिकल, चैरिटी) के लिए तय की गई आधिकारिक मानक दर। संदेह हो तो मौजूदा प्रकाशित आँकड़े की पुष्टि कर लें।
क्या इसमें टोल या पार्किंग शामिल है? नहीं। मानक माइलेज दर में ईंधन, रखरखाव, बीमा और मूल्यह्रास (डेप्रिसिएशन) शामिल होता है। टोल और पार्किंग की राशि आमतौर पर अलग से लौटाई जाती है।
क्या मैं इसे किलोमीटर के लिए इस्तेमाल कर सकता हूँ? हाँ — बस दूरी किलोमीटर में डालें और प्रति किलोमीटर दर लगाएँ; गुणा करने का तरीका बिल्कुल वही रहता है। भारत में यह तरीका ज़्यादा काम आता है।